Tata Group:
टाटा समूह दुनिया का जाना माना सबसे बढ़ा और सबसे पुराना कारोबारी समूह है इसका कारोबार कई सेक्टर्स में फेला हुआ है। हम अपने जीवन के किसी भी हिस्से को देखें तो कोई न कोई टाटा का ब्रांड हमारे जीवन में जरूर आ जाता है। जब हम ट्रेवल करते हैं तो टाटा मोटर, और हम फ्लाइट से ट्रेवल करते है तो Vistara Airlines and Air India, होटल की बात की जाये तो Taj Hotel, और आंप जो कपड़े पहनते हैं तो, Westside टाटा का Fashion brand है और जो जुआलरी पहनते हैं Tanishq Tata का है। यहाँ तक की हम जो खाने में नामक डालते है वो भी टाटा का है टाटा साल्ट।
इसके अलाबा भी Tata Steel, Tata Power, Tata Consumer Products, Titan Company आदि 100 से भी ज्यादा कंपनियां है टाटा ग्रुप के अंदर जिनमें से 26-29 कंपनियां Stock Market में Listed(सूचीबद्ध) हैं। टाटा आज के दिन इंडिया की 1 of the most famous and Successful Company है। टाटा ग्रुप रातों-रात इतना बड़ा नहीं हुआ टाटा ग्रुप को successful ग्रुप बनने में आज तक लगभग 203 साल का समय लगा।
Tata group की शुरुआत (सन 1822):
आज से 200 वर्ष पहले गुजरात के नवसारी गाँव में पारशी पुलिस के घर में एक लड़के का जन्म हुआ जिसका नाम नुसरवानजी टाटा था। नुसरवानजी टाटा में कुछ बड़ा करने की बचपन से ही बैचेनी थी। कहा जाता है कि नुसरवानजी टाटा अपने गाँव के इकलोते ऐसे व्यक्ति थे जो बड़ा स्ट्रॉनगली फ़ील करते थे की मुझे अपने गाँव से बाहर जाना है और कुछ बड़ा करना है
Nusserwanji Tata का मानना था कि इनकी destny है। इसी कारण ये सिर्फ 20 साल की आयु में अपनी बीबी और एक बच्चे {जमशेदजी टाटा (Jamsedji Tata)} के साथ अपना गाँव छोड़कर मुंबई सिफ्ट हो जाते हैं। और कोई नया बिजनस शुरू करने की कोशिस करते हैं। नुसेरवानजी टाटा कपास के व्यापार से काफी आकर्षित हुए देखते ही देखते उन्होंने अपना खुद का कॉटन एक्सपोर्ट का बिजनेस शुरू किया। नुसेरवानजी टाटा को अपने बिजनेस से जितनी भी आय होती थी उसे उन्होंने अपने बेटे की एजुकेशन पर खर्च किया।
नुसेरवानजी टाटा बिजनेस की मामले में कोई समझोता नहीं कारना चाहते थे इसीलिए इन्होंने अपने बेटे जमशेदजी टाटा को best Education दी। नुसेरवानजी टाटा का कॉटन का बिजनेस अच्छा चल रहा था कुछ समय बाद जमशेदजी टाटा 19 वर्ष के हुए और उनकी एजुकेशन समाप्त हूई। तभी नुसेरवानजी टाटा ने डिसाइड किया की अब जमशेदजी टाटा को बिजनेस expansion लिए Hong Kong भेज देते हैं लेकिन यह साल 1859 था।


जमशेदजी टाटा (सन 1859):
अभी air ट्रैवल इन्वेन्ट होने में 55 साल और थे। सन 1859 के दिनों में जमशेदजी टाटा को काफी लंबा जहाज से सफर तय करना पड़ा था जमशेदजी उस समय 20 साल के थे। नुसेरवानजी टाटा ने उन्हे इस मिसन पर भेजा की हाँगकाँग जाकर इक ऑफिश सेटल किया जाए, लेकिन जमशेदजी टाटा भी अकेले नहीं थे। इनकी भी सादी हो चुकी थी। इनके साथ इनकी बीबी और एक बच्चा भी था। इस इस्थिति में जमशेदजी के लिए बिल्कुल भी आसान फेंसला नहीं था। जमशेदजी ने हाँग काँग में रहकर व्यापार की वारीकियों को समझा और इस शाखा को सफलतापूर्वक स्थापित किया और जमशेदजी ने टाटा समूह के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की नींव रखी।
1868 में, 29 वर्ष की आयु में और अपने पिता के साथ नौ वर्षों के अनुभव से जमशेदजी ने 21,000 रुपये की पूँजी से एक व्यापारिक कंपनी शुरू की। इसके तुरंत बाद, उनका पहला इंग्लैंड अभियान चला, जहाँ उन्होंने कपड़ा व्यवसाय के बारे में सीखा। जमशेदजी ने 1869 में कपड़ा उद्योग में कदम रखा। उन्होंने बंबई के औद्योगिक केंद्र चिंचपोकली में एक जीर्ण-शीर्ण और दिवालिया तेल मिल का अधिग्रहण किया, उस संपत्ति का नाम बदलकर एलेक्जेंड्रा मिल कर दिया और उसे एक सूती मिल में बदल दिया। दो साल बाद, जमशेदजी ने मिल को एक स्थानीय कपास व्यापारी को अच्छे मुनाफे पर बेच दिया।
1874 में, जमशेदजी ने मिल को बेचकर मिले पैसों से (लगभग 1.5 लाख रुपये की प्रारंभिक पूंजी के साथ) सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग, वीविंग एंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी का एक नया व्यापार शुरू किया। 1 जनवरी, 1877 को, जिस दिन महारानी विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया गया था इसी कारण इसका नाम ‘एम्प्रेस मिल्स’ (Empress Mills) रखा गया। जमशेदजी टाटा की पहली बड़ी औद्योगिक कंपनी थी।
मैन ऑफ़ स्टील (जमशेदजी टाटा):
जब जमशेदजी अपनी कपड़ा मिल के लिए नई मशीनरी देखने मैनचेस्टर गए और थॉमस कार्लाइल के एक व्याख्यान में शामिल हुए थे। तब उन्हें लोहा और इस्पात का विचार आया। 1880 के दशक के आरंभ तक जमशेदजी टाटा ने एक ऐसा इस्पात संयंत्र बनाने का निश्चय कर लिया था जो दुनिया में अपनी तरह के सर्वश्रेष्ठ संयंत्रों में से एक हो। यह एक विशाल कार्य था।
लोहा और इस्पात परियोजना में जमशेदजी टाटा के जीवन में काफी कष्टदायक उतार-चढ़ाव आए जो किसी भी कमज़ोर व्यक्ति को परास्त कर सकते थे। लेकिन जमशेदजी इस उद्यम को सफल करने के लिए अपने दृढ़ संकल्प पर निडरता से डटे रहे। इस दौरान उन्हें ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे के मुख्य आयुक्त सर फ्रेडरिक अपकॉट जैसे काफी लोगों का तिरस्कार सहना पड़ा, जिन्होंने वादा किया था कि “टाटा द्वारा बनाई गई हर पौंड इस्पात रेल को वे खा जाएँगे”। 1912 में जब संयंत्र की उत्पादन लाइन से इस्पात का पहला पिंड निकाला गया। उस समय सर फ्रेडरिक कहाँ थे, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। जमशेदजी की म्रत्यू को तब तक आठ साल हो चुके थे।
लेकिन उनकी आत्मा और उनके बेटे दोराब और चचेरे भाई आरडी टाटा के प्रयासों ने असंभव प्रतीत होने वाले इस असंभव को संभव बना दिया। जमशेदजी टाटा का मानना था की भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ छेत्रों में मजबूत होना आवश्यक है। जमशेदजी के कुछ सपने थे। 1.हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट बनाना, 2. इंडिया में एक वर्ल्ड क्लास एजुकेशन इन्स्टीट्यूशन शुरू करना, 3. एकस्टील प्लांट खोलना, 4. एक ऐसा 5 स्टार होटल बनाना जहां पर किसी भी रंग के लोग जा सकते है। जमशेदजी अपने जीवन के समय में ये सिर्फ बंबई का ताज महल होटल बना सके।
जमशेदजी ने इसे बनाने का मन तब बनाया जब उन्हें भारतीय होने के कारण ब्रिटेन के एक होटल में प्रवेश नहीं दिया गया। उनकी बहनों ने उनसे पूछा, क्या तुम सचमुच एक भतारखाना {भोजनशाला} बनाने जा रहे हो? ताज महल होटल इससे भी कहीं ज्यादा भव्याशाली निकला। 1903 में इसके पूरा होने तक, इसकी लागत 4.21 करोड़ रुपये आयी थी। ताज महल होटल भारत का पहला ऐसा होटल था जिसमें बिजली का इस्तेमाल होता था। जिसमें अमेरिकी पंखे, जर्मन लिफ्ट, तुर्की स्नानघर, अंग्रेज़ी बटलर और कई अन्य नयीं सुविधाएँ थीं।
जमशेदजी टाटा सन 1900 में व्यापार की मामले में जर्मनी गए थे उसी बीच उनकी तबीयत बहुत बिगड़ गई थी। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण अपने चिकित्सक से मिलने के लिए इटली की यात्रा की और बाद में स्वास्थ्य लाभ के लिए जर्मनी के बैड नौहाइम में एक स्पा में गए जहां 65 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। इनका अंतिम संस्कार इंग्लैंड के ब्रुकवुड कब्रिस्तान में किया गया था। जमशेदजी टाटा की म्रत्यू के बाद उनके दो बेटों सर दौराबजी टाटा और सर रतन टाटा ने सपनों को पूरा किया और टाटा ग्रुप को आगे बढ़ाया।
सर दौराबजी टाटा और जमशेदजी टाटा के तीन बड़े सपने:
मेरे पिता के लिए धन अर्जित करना जीवन का केवल एक उद्देश्य था उनके ह्रदय में इस देश के लोगों की औद्योगिक और बौद्धिक स्थिति में सुधार करने की निरंतर इच्छा थी। और उन्होंने अपने जीवन में समय-समय पर जो भी उधम सुरू किए, उनका मुख्य उद्देश्य महत्वपूर्ण पहलुओं में देश की उन्नति करना था। लोनावला बांध की आधारशिला रखते हुए सर दोराबजी टाटा ने सन 1911 में यह बात रखी थी। टाटा ग्रुप के संस्थापक के पुत्र और उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने अपने पिता के तीनों सपनों को पूरा किया ।
जमशेदजी टाटा के तीन बड़े सपने:-
1. हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवरप्लांट बनाना : टाटा ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी टाटा के म्रत्यू से पहले उनके तीन बड़े सपनों में से एक सपना हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवरप्लांट बनाना था जिसे उनके पुत्र सर दोराबजी टाटा ने पूरा किया । उन्होंने टाटा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर सप्लाई कंपनी लिमिटेड की औपचारिक स्थापना 7 नवंबर, 1910 को खोपोली, महाराष्ट्र की पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में की थी। जहां मानशून में बारिश होती थी। इसी का लाभ उठाकर पहाड़ियों पर गिरने बाले बारीश के पानी का उपयोग करके जलविधुत का उत्पादन किया। सन 1915 में खोपोली में बिजली उत्पादन शुरू हुआ इसकी क्षमता लगभग72 मेगावाट थी। और इस सस्ती व स्वच्छ बिजली को बंबई पहुंचाया। इससे बंबई को कई बड़े और दूरगामी लाभ हुए। इस सस्ती और स्थिर बिजली आपूर्ति ने मुंबई को औधयोगिक और सामाजिक द्रश्य को पूरी तरह से बदल के रख दिया। जैसे :-
1. औद्योगिक क्रांति: पहले अधिकतर उद्योग महंगे और कोयले से चलने बाले भाप इंजन पर निर्भर थे। टाटा ग्रुप द्वारा उत्पादान की गई बिजली काफी सस्ती थी इससे उत्पादन लागत काम हूई और भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में काफी बढ़ोतरी हूई।
स्टीम इंजन की तुलना में बिजली से चलने बाली मशीनरी अधिक कुशल थी। इससे फैक्ट्रियों की उत्पादन क्षमता में अधिक व्रद्धी हूई।
बिजली उपलब्धता ने कई नए प्रकार के उद्दोगों और बिजली के नए उपकरणों के निर्माण को बढाबा दिया।
2. शहरी विकाश और आधुनिकरण: सड़कों को रोशन करने के लिए बिजली का उपयोग हुआ, जिससे शहर रात में भी सुरक्षित और सक्रिय रहने लगा।
मुंबई में लोकल ट्रेनों के विधुतिकरण में आसानी हूई। जिससे परिवहन तेज और कम प्रदूषित हुआ।
2. वर्ल्ड क्लास एजुकेशन इन्स्टीट्यूशन शुरू करना: जमशेदजी टाटा ने भारत में वैज्ञानिकी और तकनीकी शिक्षा को सन 1890 के दशक में महसूस कर लिया था। जमशेदजी ने इस परियोजना के लिय अपनी निजी संपत्ति का एक बढ़ा हिस्सा दान कर दिया था। संस्थान की स्थापना के लिए मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने बैंगलोर में लगभग 372 एकड़ ज़मीन और आवश्यक धनराशि प्रदान की थी। जमशेदजी टाटा की म्रत्यू के बाद दोराबजी टाटा ने अथक कोशिशों के बाद27 मई 1909 को ब्रिटीश भारत सरकार ने संस्थान की स्थापना के लिय विशिष्ट आदेश पारित किया। संस्थान का नाम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस(Indian Institute of Science, IISc), बैंगलोर रखा गया। जिसमे 1911 में पहला बैच और कार्य शुरू हुआ। छात्रों के पहले बैच और विभाग में केमिस्ट्री और इलेक्ट्रिक टेक्नोलॉजी शुरू की थी।
3.लौह और इस्पात कंपनी: लौह और इस्पात कंपनी जिसे अब टाटा स्टील के नाम से जाना जाता है। जिसकी स्थापना एक लंबी खोज और महान संकल्प था। जो जमशेदजी के तीन सपनों में से एक था जिसे उनके बेटे सर दोराबजी टाटा ने पूरा करने की ठानी, लेकिन इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी जगह को तलासना था जहां लौहा अयस्क, कोयला और पानी तीनों आसानी से उपलब्ध हों। दोराबजी टाटा ने अमेरिकी भू-वैज्ञानिक सीएम वेल्ड (C.M. Weld) और शपुरजी सकलतवाला की मदद से भारत के मध्य और पूर्वी हिस्सों में व्यापक खोज अभियान चलाया। भू-वैज्ञानिक पी.एन. बोस के एक पत्र के आधार पर ओडिशा के मयूरभंज क्षेत्र में लौह अयस्क के विशाल भंडार का पता लगाया। बाद में उन्हें डल्ली-राजहरा पहाड़ियों में भी उच्च गुणवत्ता वाले अयस्क मिले। दोराबजी टाटा ने इंडिया में स्टील प्लांट के लिय विदेशी निवेसको से संपर्क किया। लेकिन कोई समर्थन न मिलने के कारण उन्होंने भारतीय जनता से ही पूंजी एकत्र करने का फेसला किया। तीन सप्ताह के अंदर उन्होंने 2 करोड़ 31 लाख 75 हजार रुपए की जमा पूंजी एकत्र की औरटाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (TISCO) की नींव 26 अगस्त 1907 को रखी गई जिसमे कार्य निर्माण 1908 को शुरू हुआ था। जमशेदजी टाटा का सपना सिर्फ एक फैक्ट्री स्थापित करना नहीं था , बल्कि एक आधुनिक शहर बसाना था, जिसमें कर्मचारियों के लिए अच्छी सड़कें, आवास, अस्पताल और स्कूल हों। साकची के आसपास एक शहर का निर्माण शुरू हुआ, जिसका नाम बाद में उन्हीं के सम्मान में जमशेदपुर रखा गया। 16 फरवरी, 1912 में (TISCO) ने पहला इस्पात उत्पादन शुरू कर दिया था।
बर्ष 1912 तक टाटा का स्टील प्लांट उत्पादन के लिए शुरू हो गया था। इसी समय प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। और ब्रिटिश सरकार को सख्त जरूरत पड़ती है स्टील की। इसी बीच टाटा स्टील देश का सबसे बड़ी स्टील उत्पादन कंपनी बन जाती है। क्योंकि टाटा स्टील का स्तेमाल ब्रिटिश टैंक, हतियार बनाने और रेलवे ट्रेक बिछाने के लिए किया जाता था। यहाँ एक बड़ी प्रसिद्ध स्टेटमेंट है जो एक ब्रिटिश पॉलिटीशन के द्वारा की गई थी प्रथम विश्व युद्ध में, उन्होंने कहा था (“Tata steel saved us”) टाटा स्टील ने हमे बच लिया उनकी स्टील की क्वालिटी इतनी अच्छी थी की बम भी गिरते थे टैंक पर तो उन टैंक को पेनिट्रेट(घुसना) तक नहीं कर पाते थे।
प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद ग्रेट ब्रिटेन में एक मजबूत प्रतिष्ठा बन गई थी टाटा स्टील की। सन 1914 तक टाटा ग्रुप इतना बड़ा बन चुका था की टाटा ग्रुप के अंदर 14 अलग-अलग कंपनियां थी। भारतीय खेलों के प्रति दोराबजी टाटा का अधिक समर्थन रहा है। उन्होंने 1920 और 1924 के ओलंपिक में भारतीय दल भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत में ओलंपिक आंदोलन के लिए समय, प्रयास और धन समर्पित किया। और भारतीय ओलंपिक संघ के पहले अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे खुद एक कुशल एथलीट थे। अपनी युवावस्था में उन्होंने पारसी जिमखाना क्रिकेट टीम की कप्तानी की और कैम्ब्रिज में रहते हुए नौकायन सहित कई खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
दोराबजी अपनी पत्नी मेहरबाई के प्रति अत्यंत समर्पित थे। ल्यूकेमिया से उनकी असामयिक मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी सारी संपत्ति परोपकार और कैंसर अनुसंधान के लिए दान कर दी थी। उन्होंने उनकी स्मृति में एक रेडियम अनुसंधान संस्थान की स्थापना की, जो बाद में टाटा मेमोरियल सेंटर बन गया। सर दोराबजी टाटा का निधन 3 जून, 1932 को बैड किसिंगेन में हुआ, जब वे अन्य कर्तव्यों के साथ-साथ लंदन में अपनी प्रिय पत्नी की कब्र पर जाने के लिए रास्ते में थे। दोराबजी टाटा ने लगभग 28 वर्षों तक कंपनी का नेतृत्व किया। इसके बाद इनके दूर के कजन जहांगीर रतन टाटा ने कम्पनी को अधिग्रहण किया।
टाटा ग्रुप के चौथे चेयरमेन जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा):
टाटा ग्रुप के चौथे चेयरमेन जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा(J.R.D.Tata) का जन्म 29 जुलाई, 1904, पेरिस(फ्रांस) में हुआ था। J.R.D.Tata फ़्रांस में ही बड़े हुए और वहाँ पर ये एक पायलट भी थे। इन्हे फ्लाइंग करने का एक बड़ा सौक था।
इनके पिता आरडी टाटा, जमशेदजी टाटा के व्यापारिक साझेदार और रिश्तेदार थे, और उनकी फ्रांसीसी पत्नी सूनी थीं। चार बच्चों में दूसरे नंबर पर जन्मे जेआरडी ने फ्रांस, जापान और इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त की, जिसके बाद उन्हें अनिवार्य रूप से एक साल के लिए फ्रांसीसी सेना में भर्ती कर लिया गया। जेआरडी सेना में अपना कार्यकाल बढ़ाना चाहते थे। लेकिन इनके पिता ने इन्हें अनुमति नहीं दी। जेआरडी ने कैम्ब्रिज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने का निर्णय लिया, लेकिन आरडी टाटा ने अपने बेटे को भारत वापस बुला लिया (जेआरडी को विश्वविद्यालय में न जाने का हमेशा अफसोस रहा)। जेआरडी ने दिसंबर 1925 में अवैतनिक प्रशिक्षु के रूप में टाटा समूह में प्रवेश किया। उनके व्यापारिक मार्गदर्शक जॉन पीटरसन थे, जो एक स्कॉटिश नागरिक थे और भारतीय सिविल सेवा में सेवा देने के बाद समूह में शामिल हुए थे। 22 वर्ष की आयु में, अपने पिता के निधन के तुरंत बाद, जेआरडी समूह की प्रमुख कंपनी टाटा संस के बोर्ड में शामिल हो गए। 1929 में, 25 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपनी फ्रांसीसी नागरिकता त्याग दी और उस देश को अपना लिया जो उनके जीवन का केंद्रबिंदु बन गया।
इन्होंने 1932 में टाटा एयरलाइंस की स्थापना की, जो बाद में एअर इंडिया के नाम से जानी गई। भारतीय विमानन के इतिहास में पहली उड़ान कराची के ड्रिघ रोड से जेआरडी के नेतृत्व में एक पस मॉथ विमान के साथ भरी गई। जेआरडी ने 1953 तक अपनी एयरलाइन कंपनी को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। सन 1947 में जब देश को आजादी मिलने के बाद देश के प्रधान मंत्री जबाहरलाल नेहरू ने फेसला लिया की देश में जीतने भी बड़े व्यापार और संस्थाएं है। उन्हे सरकार कंट्रोल करेगी। और सरकार ने एयर इंडिया का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया। यह एक ऐसा निर्णय था जिसका जेआरडी ने पूरे दिल से विरोध किया था। जब सरकार के एक अन्य कानून ने उन्हें पद से हटा दिया। इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी के बाद जेआरडी को फिर से अध्यक्ष बना दिया। यही कारण है की 1970s-1980s में एअर इंडिया को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित एयरलाइनों में से एक माना जाता था।
इसके अलाबा जे.आर.डी.टाटा ने बहुत से व्यापार शुरू किए सन 1945 में टाटा मोटर्स का पहला प्रोडक्ट बनाया गया। पटरियों पर चलने बाले लोको मोटिव इंजन, सन 1968 में इन्होंने Tata Consultancy Services(TCS) की स्थापना की जो इलेक्ट्रॉनिक डेटा प्रोसेसिंग सर्विस प्रदान करती है। आज के दिन TCS देश का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है, इंडियन रेल्वे के बाद। इसके अलाबा उन्होंने भारत के वैज्ञानिक, चिकित्सा और कलात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड साइंसेज और नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स, ये सभी संस्थान अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता के प्रतीक हैं। जेआरडी टाटा के लिए ‘राष्ट्रीय हित’ शब्द का अर्थ था देश की वैज्ञानिक और आर्थिक क्षमताओं को आगे बढ़ाना। । जेआरडी ने देश की जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के तरीकों को खोजने और उनका प्रचार-प्रसार करने में काफी समय और संसाधन खर्च किए। इसी उद्देश्य से उन्होंने उस संस्था की स्थापना में सहयोग दिया जो बाद में अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या अध्ययन संस्थान बन गई। 1992 में, जेआरडी को संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके जीवन भर के इस जुनून का एक देर से मिला सम्मान था। उन्हें कभी सम्मानों की लालसा नहीं थी, लेकिन उन्हें भरपूर सम्मान मिलते रहे, जिससे वे अक्सर हैरान रह जाते थे। जब उन्हें बताया गया कि भारत सरकार उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, भारत रत्न देने पर विचार कर रही है, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा: “मुझे क्यों? मैं इसके योग्य नहीं हूँ। भारत रत्न आमतौर पर मृत व्यक्तियों या राजनेताओं को दिया जाता है। मैं सरकार की इस इच्छा को पूरा करने के लिए तैयार नहीं हूँ और न ही मैं राजनेता हूँ।”
पेरिस में 1930 में प्रेम प्रसंग के बाद उन्होंने और उनकी पत्नी थेल्मा ने विवाह किया था। उनके कोई संतान नहीं थी, लेकिन जेआरडी बच्चों के साथ सबसे सहज महसूस करते थे। वयस्कों के साथ, जो कि अधिक जटिल स्वभाव के होते हैं, उन्होंने एक उदार भावना का प्रदर्शन किया, जो यह मानती थी कि चाहे व्यवसाय हो या जीवन, मायने तो इंसान ही रखते हैं। 29 नवंबर, 1993 को जिनेवा के एक अस्पताल में जब जेआरडी ने अंतिम सांस ली, तो यह सचमुच कहा जा सकता है कि एक युग का अंत हो गया। भारत का एक महान अंश—और भारतीयता—हमेशा के लिए मिट गया।
J.R.D.Tata 52 वर्ष चेयरमेन रहे टाटा ग्रुप के और इन 52 वर्षों में टाटा ग्रुप के अंदर अब 95 कंपनी हो चुकी थी। सन 1969 में सरकार ने एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथा अधिनियम पारित किया और इसका सबसे ज्यादा असर टाटा ग्रुप पर पड़ा। सरकार का मानना था की कोई भी कंपनी इतनी बड़ी ना बन जाये की हर चीज में उसका एक अधिकार न हो जाये। ऐसे नियम पास होने के बाद भी J.R.D.Tata के अंदर टाटा ग्रुप ओर भी बड़ा बनता गया। जैसे-जैसे टाटा ग्रुप के अंदर कंपनियों की संख्या बढ़ती गई ये टाटा संस की ओनरसिप कम करते गए। लेकिन कुछ वर्ष बाद यह दृष्टिकोण बुरा साबित हुआ व्यापार के लिए। जैसे की इनका इलेक्ट्रॉनिक व्यापार नेल्को (Nelco), जो रेडियो निर्माण करता था 1971 में नेल्को का मार्केट शेयर 20% से 2% पर आकर गिर चुका था। तभी सन 1971 में रतन नबल टाटा को नेल्को का कार्यभार दिया गया। रतन टाटा ने रेडियो का निर्माण बंद किया और Satellite Communication जैसी नई तकनीकों में निर्माण शुरू किया। सन 1975 तक नेल्को का शेयर बापस 20% हो गया।
रतन नवल टाटा (टाटा समूह के 5th चेयरमेन):
नवल और सूनू टाटा के पुत्र श्री टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को हुआ था। श्री टाटा ने कैम्पियन और फिर कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन (दोनों बॉम्बे में) में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की, जहाँ उन्होंने अपने स्कूली शिक्षा के अंतिम तीन वर्ष बिताए। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय चले गए, एक ऐसा देश और वहां की संस्कृति जिससे श्री टाटा को बेहद लगाव हो गया। कॉर्नेल विश्वविद्यालय में उन्होंने वास्तुकला और संरचनात्मक अभियांत्रिकी का अध्ययन किया और 1955 से 1962 तक अमेरिका में बिताए। 1962 में श्री टाटा को समूह की प्रमोटर कंपनी टाटा इंडस्ट्रीज में नौकरी की पेशकश की गई (वे 1963 में टिस्को (अब टाटा स्टील) में शामिल होने से पहले टेल्को (अब टाटा मोटर्स) में छह महीने बिताएंगे)। कॉर्नेल विश्वविद्यालय में वापस आकर, श्री टाटा ने अपने पिता की इच्छा का पालन करते हुए, न कि अपनी किसी वास्तविक रुचि के कारण, शुरुआती दो साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई में बिताए। फिर उन्होंने वास्तुकला में दाखिला ले लिया। उन्होंने सात साल से भी कम समय में दोनों पाठ्यक्रम पूरे कर लिए। 1993 में जेआरडी के निधन के बाद समूह पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए श्री टाटा द्वारा लड़े गए संघर्षों का वर्णन अक्सर किया जाता रहा है। लेकिन जिस बात पर बहुत कम ध्यान दिया गया है, वह है श्री टाटा द्वारा अपने ऊपर किए गए हमलों के बावजूद दिखाई गई शालीनता। शराब और धूम्रपान से परहेज करने वाले श्री टाटा ने जानबूझकर अविवाहित रहना चुना।
सन 1969 में श्री टाटा ने ऑस्ट्रेलिया में टाटा समूह के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में काम किया। और 1970 में भारत बापस लौटकर, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में थोड़े समय के लिए शामिल हुए, जो उस समय सॉफ्टवेयर क्षेत्र में एक नवोदित कंपनी थी। सन 1971 में उन्हें नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स (जिसे नेल्को के नाम से बेहतर जाना जाता है) का कार्यवाहक निदेशक नियुक्त किया गया, जो एक बीमार इलेक्ट्रॉनिक्स उद्यम था। 1974 में टाटा संस के निदेशक मंडल में निदेशक के रूप में शामिल हुए। और टाटा ग्रुप के लिए बड़े मुकाम हासिल किए। जैसे :-
- 1975: हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम पूरा किया।
- 1981: टाटा इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष नियुक्त हुए; कंपनी को उच्च-प्रौद्योगिकी व्यवसायों के प्रमोटर के रूप में बदलने की प्रक्रिया शुरू की।
- 1983: टाटा की रणनीतिक योजना का मसौदा तैयार किया।
- 1986-1989: राष्ट्रीय विमानन कंपनी एयर इंडिया के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
- 25 मार्च, 1991: जेआरडी टाटा से टाटा संस के अध्यक्ष और टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया।
- 1991: टाटा समूह का पुनर्गठन ऐसे समय में शुरू हुआ जब भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण चल रहा था।
- 2000 के बाद से: उनके नेतृत्व में टाटा समूह की वृद्धि और वैश्वीकरण की मुहिम ने गति पकड़ी और नए सहस्राब्दी में टाटा द्वारा कई हाई-प्रोफाइल अधिग्रहण देखे गए, जिनमें टेटली, कोरस, जगुआर लैंड रोवर, ब्रूनर मोंड, जनरल केमिकल इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स और देवू शामिल हैं।
- 2008: टाटा नैनो को लॉन्च किया, जो उस अग्रणी छोटी कार परियोजना का परिणाम थी जिसका उन्होंने उत्साह और दृढ़ संकल्प के साथ मार्गदर्शन और नेतृत्व किया था।
- 2008: भारत सरकार द्वारा उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
- दिसंबर 2012: टाटा समूह के साथ 50 वर्षों के बाद टाटा संस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया; टाटा संस के मानद अध्यक्ष नामित किए गए।
श्री टाटा ने मित्सुबिशी कॉर्पोरेशन और जेपी मॉर्गन चेस के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार बोर्डों में अपनी सेवाएं दीं। टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपना कार्यकाल जारी रखा और भारत के दो सबसे बड़े निजी क्षेत्र द्वारा संचालित परोपकारी ट्रस्टों, सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट का संचालन किया। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के प्रबंधन परिषद के अध्यक्ष, कॉर्नेल विश्वविद्यालय और दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के न्यासी मंडल के सदस्य के रूप में कार्य किया और टाटा-कॉर्नेल कृषि एवं पोषण संस्थान की स्थापना की। उन्हें भारत और विदेशों के कई विश्वविद्यालयों से मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में टाटा हॉल का निर्माण 2013 पूरा हुआ और इसका नाम रतन टाटा के सम्मान में रखा गया। 2014 में स्टार्टअप्स में निवेश करना शुरू किया, उस समय जब भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम अभी उभर रहा था। उसी समय ब्रिटिश साम्राज्य के ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (GBE) के नाइट ग्रैंड क्रॉस से सम्मानित किया गया। 2015 में, श्री टाटा द्वारा 1998 में देश की पहली पूर्णतः स्वदेशी कार, इंडिका का उत्पादन करने और उसके बाद 2008 में अभूतपूर्व नैनो का निर्माण करने के प्रयासों को मान्यता देते हुए, उन्हें ऑटोमोटिव हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया। टाटा ट्रस्ट्स ने 2017 में कैंसर केयर प्रोग्राम शुरू किया। इसने इस क्षेत्र में ट्रस्ट्स के प्रयासों को गति दी – जो 1941 में मुंबई में टाटा मेमोरियल सेंटर से लेकर 2011 में कोलकाता में टाटा मेडिकल सेंटर तक फैला हुआ है – और भारत में कैंसर देखभाल सुविधाओं और कैंसर अस्पतालों के बढ़ते नेटवर्क तक पहुंचा है। और सन 2022 में रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन की स्थापना की गई। श्री रतन टाटा ने 1991 से 2012 तक समूह के चेयरमैन रहे, और फिर अक्टूबर 2016 से फरवरी 2017 तक अंतरिम चेयरमैन के रूप में कार्य किया।
रतन नवल टाटा के बाद, टाटा ग्रुप के चेयरमेन पड़ में दो बड़े बदलाब किए गए। रतन टाटा ने 2012 में पद छोड़ने के बाद सायरस मिस्त्री को टाटा संस (टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी) का चेयरमैन नियुक्त किया था। सायरस मिस्त्री को अक्टूबर 2016 में हटाने के बाद, रतन टाटा ने कुछ समय के लिए अंतरिम चेयरमैन के रूप में कार्य किया। इनके बाद, नटराजन चंद्रशेखरन (एन. चंद्रशेखरन) को टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया गया, और वह अभी भी इस पद पर कार्यरत हैं। श्री टाटा का 86 वर्ष की आयु में अक्टूबर 2024 में निधन हो गया।इनके निधन के बाद, इनके सौतेले भाई नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन नियुक्त किया गया है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में बड़ी हिस्सेदारी (66%) है, लेकिन टाटा ग्रुप के कार्यकारी चेयरमैन अभी भी एन. चंद्रशेखरन हैं।
निष्कर्ष:
टाटा ग्रुप दुनिया भर में प्रसिद्द भारत का सबसे पुराना (अब 2025 तक 203 वर्ष हो चुके हैं।) ग्रुप है। टाटा ग्रुप कोई एक कंपनी नहीं, बल्कि 100 से अधिक स्वतंत्र रूप से काम करने बाली कंपनियों का एक विशाल ग्रुप है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। टाटा ग्रुप का कारोबार सीमित नहीं है यह कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फेला हुआ है। 150 से अधिक वर्षों के इतिहास में, इसे भारत में सबसे विश्वसनीय ब्रांडों में से एक माना जाता है। टाटा ग्रुप ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कला और संस्कृति जैसे सामाजिक कार्यों में धन लगाया है। टाटा समूह का मिशन सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि “जिन समुदायों की हम सेवा करते हैं, उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना” है। टाटा ग्रुप एक विशाल, विविध और नैतिक भारतीय व्यापारिक समूह है जो वैश्विक स्तर पर सक्रिय है।
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